Tuesday, May 12, 2020

लेख:- अभिषेक पाण्डेय (लल्ला गोरखपुरी)
--------------------------------------------------------
🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹🌳🌹
हे भारत के राम जगो!🙏

आज वैश्विक स्तर पर जिसप्रकार भारत इस महामारी के दौर में पूरी ऊर्जा, लगन और कौशल के साथ अपनी स्थिति को मजबूत बनाये हुए है वह वास्तव में सराहनीय है। प्रतिदिन आ रहे नए कोरोना मामलों के बावजूद आज भारत वैश्विक स्तर पर कोरोना मरीजों की रिकवरी और अन्य नए मामलों के रोकथाम हेतु अच्छा काम कर रहा है। कोरोना जांच के मामले को देखा जाये तो आज देश में 15 लाख से ऊपर जांच हुए हैं जो अनवरत जारी है।
सुरक्षा मानकों एवमं सुविधाओं के परिपेक्ष्य में बात करें तो
*इमरजेंसी में चीन से मंगाए गए पीपीई किट्स में मिली खामियों को ध्यान में रखते हुए भारत के द्वारा स्वदेशी किट निर्माण का कार्य प्रारम्भ किया गया। आज भारत की कुल 111 कम्पनियों ने N95 मास्क और 2 लाख पीपीई किट्स का निर्माण प्रतिदिन कर रही हैं। इसके माध्यम से पिछले 2 महीनों में 7000 करोड़ के व्यवसाय को खड़ा कर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और सप्लायर देश बनकर उभरा है। जिस किट की कीमत सब्सिडी छोड़कर आम नागरिकों के लिए भारत में प्रति किट 3000₹ थी आज भारत उसी किट को मात्र 600₹ में तैयार कर रहा है। वहीं देश की बड़ी प्रद्योगिकी संस्थाएं अन्य आवश्यक नव तकनीकी सामग्रियों जैसे जीवन रक्षक प्रणाली (वेंटिलेटर), मास्क, डीआरडीओ द्वारा निर्मित UV ब्लास्टर नामक डिसइन्फेक्शन टावर आदि का बड़े पैमाने पर निर्माण में महती भूमिका निभा रही हैं।
* IIT कानपुर  व भारत डायनामिक्स के साझे प्रयासों से सस्ते दामों पर वेंटिलेटर तैयार किया जा रहा है साथ ही साथ IIT दिल्ली ने लगभग 50 बार, धुलकर पुनः प्रयोग में  लायी जाने वाली  N-safe एंटीमाइक्रोबियल मास्क का निर्माण किया है व अन्य कई दवा की कम्पनियां  दवा का निर्माण कर रही हैं।
 जहां भारत में पीपीई किट्स, दवा आदि का प्रोडक्शन कभी शून्य था आज वह वैश्विक स्तर पर एक मानक स्थापित कर रहा है तथा भारत अन्य देशों के लिए आपूर्ति कर्ता के रूप में उभर कर सामने आया है।। अन्य कई छोटे देशों जैसे मालदीव, क्रोएशिया, दक्षिण अफ्रीकी कॉन्टिनेंट के कई देश जो आज कोरोना व डेंगू से बुरी तरह प्रभावित हैं उनको भारत द्वारा रसद सामग्री, दवाएं, किट्स, मास्क,  और डॉक्टरों की आपूर्ति की जा रही है।
किसी भी देश के उत्थान की भूमिका वहां के व्यक्तियों और उनकी प्रशासन व प्रकृति के बीच आपसी समन्वयन से सुदृढ़ होती है। संविधान का मूल तत्व व्यक्ति हित और व्यक्तित्व निर्माण पर निर्धारित है। आज सरकारी तंत्र को इस बात को लेकर पूर्णतया सजग होना होगा असल में संविधान की रक्षा तभी हो पाएगी जब हम व्यक्ति और व्यक्तित्व विकास को बेहतर कर पाएंगे। हालांकि यह जिम्मेदारी सिर्फ तंत्र तक नही बल्कि तंत्र के निर्माण कर्ताओं की भी है जो संविधान के मौलिक अधिकारों की तो बात करते हैं पर मौलिक कर्तव्यों के प्रति अचेतावस्था में हैं। इस महामारी को जहां भारत स्वविकास के अवसर के रूप में देख रहा है उसको अमली जामा पहनाने के लिए नागरिकों का दायित्व सर्वाधिक है। एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 90 लाख किसानों ने खेती करना छोड़ कर दूसरे राज्यों में मजदूरी करने के लिए मजबूर हुए उदाहरण के तौर पर देखें तो महाराष्ट्र में ही बिहार से लगभग 46 लाख और उत्तर प्रदेश से लगभग 6 लाख किसान और अन्य कमजोर वर्ग के लोग कार्य कर रहे हैं और ऐसे ही कई राज्यों के मजदूर/कृषक वर्ग जिसमें कि अधिकांशत: इस महामारी के कारण आज भारत के अन्य राज्यों से पलायन कर स्वगृह वापस आये हैं या आ रहे हैं व अपनी आजीविका के लिए पुनः कृषि कार्यों में जुट गए हैं जिससे कृषि क्षेत्र में किसानों की 5.8% की वृद्धि हुई है। आज भारत सरकार को ऐसे विस्थापन के लिए मजबूर हुए किसानों के लिए अपनी किसान नीतियों में सुधार के साथ साथ, कृषि सुधार कार्यक्रमों को ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों माध्यमों से सुदृढ़ करना होगा जिससे यह विस्थापन दुबारा ना हो।। कृषि व्यवसायिक केंद्रों को पारदर्शी बनाने के साथ ही सरकार द्वारा लांच किए गए "कृषि सभा एप" का बेहतर क्रियान्वयन कराना होगा जिससे किसान नई फसल योजनाओं के बारे में और कृषि कार्यों के विविध आयामों से अवगत हो सकें।। किसान बीमा योजना, किसान निधि योजनाओं के प्रति सुदृढ़ और सजग रवैया अपनाना होगा। मल्टीलेयर फार्मिंग को और बढ़ावा देना होगा। आज प्रधानमंत्री जी ने 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' के परिप्रेक्ष्य में जिस चार L (लैंड , लेबर, लिक्वीडिटी, और लॉज) के संदर्भ में बात करते हुए कुटीर उद्योगों, लघु उद्योगों, MsME आदि के लिए विभिन्न प्रावधानों के अधीन 20 लाख करोड़ के पैकेज की बात कही है वह स्वागतयोग्य है। कभी कभी बाहर की चकाचौंध देखने में हमारी आंखे इतनी खो जाती हैं कि हम अपने आसपास की आवश्यक चीजों पर ध्यान नही दे पाते और ये कमजोरी दीमक की भांति हमें खोखली करने लगती है। इस भयावह स्थिति ने हमें पुनः हमारे घर को वापस सुदृढ़ और सुव्यवस्थित करने का मौका दिया है और इसको ध्यान में रखते हुए लोकल स्तर पर आजीविका के साधनों को स्थापित करने की प्रतिबद्धता के साथ चल रही व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार का यह कदम प्रसंशनीय है।।
हम भारतीय लोग ध्वंस से सृजन की विधि की कहानियां सुनते पले बढ़े हैं और जब भी देशकाल को अस्तित्व की रक्षा हेतु हमारी आवश्यकताएं पड़ीं हमने अनेक सस्ते किन्तु बेहतरीन माध्यमों से उन परिस्थितियों से निबटा है।।
हर घड़ी हम हनुमान से प्रेरणा तो लेते हैं पर जामवंत की कमी के कारण चूक जाते हैं। किन्तु यह समय हमें स्वावलम्बी बनाने के साथ साथ सतर्क और तेज बनाने का हुनर भी सिखा रहा है औऱ हमारे ध्येय वाक्य "उठो! जागो!  और लक्ष्य प्राप्ति तक बढ़ते रहो" को साधने के लिए प्रेरित कर रहा है।। अतः स्वागत करिये।।

Wednesday, April 1, 2020

बँधुआ शिक्षा
और बँधुआ शिक्षानीति
एक चक्की के आसपास
गुलामों जैसे मंडराते विचार
काश! अपने ज्ञान को और विस्तार देते
तो शायद आज
ये कत्तई नहीं होता।
तुम नहीं पोषते
पीढ़ियों के कुंठित विचार
रूढ़ियों के दीमक
जो अभी भी नही होने दे रहे
तुमको हरा भरा।

तुम इस्तेमाल करते
सद्विचारों का ब्लीचिंग पाउडर
और साफ करते
कहीं सिमटे हुए जल की भांति
दुर्गंध फैलाती मानसिकता को,
बनाते एक रास्ता
जो पहुंचाती तुम्हे दरिया से
समंदर की अथाह गहराईयों तक
जहाँ रहस्य और प्राप्ति
तुम्हें मग्न कर देते
अपनी पजल सुलझाने में।

तुम समझ पाते
आसपास हो रही घटनाओं के मर्म को,
तुम देख पाते पतझड़ जैसे
सूखे पत्तों सा गिरता जीवन,
तुम महसूस करते मानवता,
लुटने से बचा पाते
मदद का दामन।

तुम बना पाते
मानवीय नैतिकता के पुल,
एक उद्यमी की भांति
सहज जोड़ पाते ख़ुद को
आधुनिक विज्ञान से
जहां खिलते हैं नये नये
शोध के फूल,
तुम समझ पाते आइंस्टीन की थ्योरी
गुरुत्वाकर्षण के नियम
क्रिया प्रतिक्रिया की रूपरेखा को
रामानुजन के गणितीय सिद्धांत
जैविक विकास के क्रम को
आर्यभट्ट के खगोल को
बीरबल साहनी के वानस्पतिक शोध को
अबू मूसा के रसायन,
दर्शन और ज्योतिष के प्रति समर्पण को
मुहम्मद इब्न मूसा के अलजेब्रा
और अल्गोरिथम के प्रयोग को
कलाम के अद्वितीय स्वरूप को।
तुम समझ पाते जीवन की प्रयोगशाला को
तुम कर पाते अनेकानेक प्रयोग,
जीवन के निमित्त।

पीछे की ओर लोच लेती गर्दन
जब ले जाती दिखाने तुम्हें
ऊपर का नीला आकाश,
दरम्यान उसके तुम देख पाते
ऊपर चढ़ती हुईं पर्वत मालाओं को
आसमान छूने को लालायित पेड़ों को
मुस्कुराते फूलों को
जमीं से उड़ान भरते
परिंदों के जत्थे को,
पनघट की प्यास को
लचकती कमर के ऊपर
ठुमकते घड़े को,
सतरंगी संसार की सुंदरता को
और फिर समझ पाते
इसके होने के कारण को
उत्थान की उत्कंठा को
बचाने की जिजीविषा को।

काश ! अपने ज्ञान को और विस्तार देते
काश!...

(लल्ला गोरखपुरी)

Wednesday, March 25, 2020

हर सतरंगी सुबह
लेकर आती है सौगात
बंदर मामा चिहुँक गए हैं
सुनकर अदरक वाली बात

गौरैया आंगन में आई
दाना चुगकर चोंच में लायी
अम्मा कीर्तन गाये जात
चींटी की निकली बारात

छोड़ मोबाईल खेलो कूदो
पाठ पढ़ो और माने ढूंढो
मुश्किल सारी खाये मात
बाबा भी समझाये जात

पढ़ लिखकर इंसान बनेंगे
सज्जन और महान बनेंगे
मिल जाएगी सब ख़ैरात
जीवन की ये मानो बात

(लल्ला गोरखपुरी)
एक बाल कविता ।।।
लेख – लल्ला गोरखपुरी

(COVID-19  और प्रकृति के बीच दुनिया)
🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳
"उत्साहो बलवानार्य नासत्युत्साहत्परं बलम्"
🙌.                                                    🙌
विजय उत्साहियों के गोद में खेलती है, उत्साह बल देता है,  बड़े से बड़ा खिलाड़ी उत्साह के अभाव में छोटे से छोटा खेल हार जाता है, वह उत्साह स्वजनित हो या पर जनित, थाली से हो या ताली से उसकी आवश्यकता को आधुनिक विज्ञान की कसौटी या मात्र लाभ हानि की बाजारवादी सोच से नही तय किया जा सकता। प्रत्येक काल का अपना अनुसंधान रहा है और प्रत्येक काल में मानवता के लिए विकट या मानवता के निकट अनेक प्रयोग हुए और सबकी अपनी सार्थकता रही है। हजारों वर्षों से प्राकृतिक संरक्षण  और व्यक्तित्व विकास के साथ मानवता के हित के लिए हुए प्रयोगों ने आम जनजीवन को खुशहाल बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयोग किये चाहे वह वृक्षों, पशुओं, पर्वतों, नदियों आदि के प्रति आस्था का दृष्टिकोण हो या संगीतों, वाद्य यंत्रों आदि के प्रकार या लय की सुखानुभूति और प्रसन्नता के साथ एक सूत्र में जोड़ने का साधन रहे हों। आज के विज्ञान की अपनी प्रासंगिकता है, आवश्यक है मूल को सहेजते हुए आज की ऊंचाइयों तक पहुंचने की प्रत्येक रस में सामंजस्य स्थापित करने की ना कि तुलनात्मक आरोपों के साथ त्यागने की। ध्येय यदि रक्षक रहा है तो उसे बचाना हमारा कर्तव्य है ना कि आधुनिकता के आड़ में उसका हनन करना।
    आज विश्व के अधिकांश देश कोरोना वायरस COVID-19 (SARS corona virus family) से जीवन और मृत्यु के बीच अपने जीवन की रक्षा हेतु जूझ रहे हैं जिसे WHO ने वैश्विक महामारी घोषित कर दिया है। इस RNA वायरस ने छुआछूत के सही मायनों को इसप्रकार रेखांकित किया है कि त्राहिमाम् के आह्वान के साथ सम्पूर्ण मानवता आज एक सूत्र में बंधती नजर आ रही है। दुनियाभर से आई रिपोर्ट के अनुसार आज लगभग 4लाख 28 हजार लोग इस महामारी से संक्रमित हो चुके हैं तथा 19000 लोग काल के गाल में समा चुके हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार DALY(Disability adjusted life year) में जहाँ आज दुनिया का औसतन दूसरा सबसे अधिक ओल्ड एज पॉपुलेशन वाला देश इटली जिसकी कुल जनसंख्या 6 करोड़ है जिनकी औसत आयु सीमा 81 वर्ष है आज वहां सबसे अधिक लगभग 50 हजार से भी ज्यादा लोग संक्रमण के गिरफ्त में हैं  और 5 हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। हालांकि इसमें मरने वाले लोग अधिकांशतः फेफड़े, किडनी, कैंसर आदि के मरीज रहे हैं या जिनकी उम्र 55-60 से अधिक रही है।
  चीन के वुहान शहर से उत्पन्न यह वायरस जहां दुनियाभर में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व वैज्ञानिक व्यवस्थाओं व दृष्टिकोण को प्रभावित कर रहा है वहीं चीन  अब इस संक्रमण के फैलाव को नियंत्रित करने में धीरे धीरे सफल भी हुआ है। चीन में लगभग 82000 से अधिक लोग इसकी गिरफ्त में हैं और लगभग 4000 लोग मारे जा चुके हैं। उम्र के हर पड़ाव को प्रभावित करने वाला यह वायरस जहां 60-65 वर्ष या इससे अधिक उम्र के लोगों के लिए सर्वाधिक जानलेवा है वहीं भौगोलिक दृष्टि से चीन के नजदीक 12 करोड़ आबादी वाला जापान जिसमें औसतन दुनिया की सबसे अधिक ओल्ड एज पॉपुलेशन (कुल जनसंख्या का 1/4 से अधिक) निवास करती है वह इतनी भयावह स्थिति से बचा हुआ है क्यों? इसका केवल एक ही कारण कि जापान में जनवरी से ही जापान-चीन हवाई यात्राओं पर रोक या देश के कुछ हिस्सों में समय रहते लॉकडाउन करना मात्र नहीं है अपितु वर्षों पूर्व में आयी कई बीमारियों (H1N1 virus, SARS virus आदि) से सतर्कता के लिए उठाए गए कदम जैसे Face mass culture of Japan, अधिकांशतः जैपनीज़ बाओ में ग्रीट  करना, भोजन से पहले हाथ, पैर धुलना आदि है  जो आज उनके दैनिक जीवन का हिस्सा हैं जिसके कारण वह बहुत कम लोगों से फिजिकल टच में आते हैं। हालांकि यह पूर्ण निदान नहीं है। दिसम्बर में ही चीन के एक ophthalmologist डॉ.ली वेन यांग ने इस वायरस के प्रति जब दुनिया को सचेत करना चाहा तो चीन ने आधिकारिक तौर पर रोक लगा दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि दुनिया सतर्क होती कि इससे पहले यह वायरस उग्रतम रूप धारण कर लिया वहीं चीन के द्वारा की गई दूसरी और बड़ी गलती जिससे हमें सीखना होगा कि चीन ने अपने बड़े औद्योगिक शहर वुहान में लॉकडाउन करने से कुछ दिन पहले ही इसकी घोषणा कर दी जिसका परिणाम यह हुआ कि लगभग 50 लाख लोग शहर छोड़ कर अपने घरों को वापस चले गए और साथ ही साथ वायरस भी ले गए और इसप्रकार कई यूरोपीय और एशियन देशों में यह संक्रमण आसानी से फैल गया। भारत की औसतन ओल्ड एज पॉपुलेशन 6% ही है अर्थात विश्व का सबसे बड़ा युवा देश जहाँ चौथा सप्ताह आते आते  लगभग 500 मामले सामने आ चुके हैं और लगभग 40-50 लोग पूर्णतः ठीक भी हो चुके हैं ऐसे में भारत के सामने गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही एक बड़ी जनसंख्या को सुरक्षित रखना और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करना आज भी एक कठिन चुनौती है यदि इस वायरस के रोकथाम के प्रति हम स्वतः में सचेत नही हुए तो हमें भी अन्य देशों की भांति बहुत क्षति उठानी पड़ सकती है। हमें Social distancing और Lockdown के नियमों का अनिवार्यतः पालन करना होगा, दिनचर्या में सुधार के साथ सरकारी दिशानिर्देशों के अनुरूप चलते हुए देशहित में सहयोगी बनना होगा। प्राकृतिक संरक्षण और संवर्धन में मानवीय भूमिका ही मानवता को सुरक्षित रख सकती है। यह natural reclamation का दौर है जिससे हमें प्रकृति द्वारा प्रदान की गई प्रत्येक वस्तुओं से सामंजस्य स्थापित करने की ना कि शासन व हनन करने की सीख भी लेनी होगी।।
जो सौम्य है, शांत है
सहज है, नितांत है
धैर्य का वृतांत है
वही शिव है

जो सागर का हलचल है
रागों का बादल है
प्रेमी सा पागल है
वही शिव है

जो गुढ्य है, गंभीर है
प्रशांत सा सुधीर है
नेह का नीर है
वही शिव है

जो शून्य में साकार है
अनंत का आकार है
निस्पृह निराकार है
वही शिव है

जो मृदंग का साज है
रागों का राज है
मूक है, आवाज है
वही शिव है

जो फक्कड़ है, दिगम्बर है
अघोरी है, पयम्बर है
शक्ति का स्वयंबर है
वही शिव है

जो उद्भव है, विलीन है
आदि है, अर्वाचीन है
भोला है कुलीन है
वही शिव है

जो आकृति है, दर्पण है
अर्पण है, तर्पण है
विरक्त है, समर्पण है
वही शिव है

(लल्ला गोरखपुरी)

Wednesday, November 27, 2019

कभी कभी अनुभव का दायरा इंसान को कर्तव्यों से बहुत दूर लेकर चला जाता है, लेकिन इससे पहले कि हम कहीं भटक ना जाएं,
हमें जरूरत होती है अपनी निष्ठा पूर्वक बनाई गई चीजों को सहेजने की, उसके साथ सदा ईमानदार रहने की।
कर्तव्यों से दूर एक बारीक लकीर है ,यह महज एक लकीर नही चेतना का मंच है जहां नाचती है मुग्धता, देखता है आत्मसम्मान, संगीत गाती वासना और निर्णय कर्ता कर्म।
हमें जरूरत होती उस लकीर के दरम्यान अपने चेतना के साथ सत्कर्मों की, वासना हर बार पर्दा डाल देती और नए नाटक का मंचन करती आत्मसम्मान के सामने। इसी बीच शुरू होता अपने नजरों में सदा उठा हुआ मष्तिष्क का विचरण जहां हर विचार एक उपद्रव होता है जो मंच को बनाने के लिए आता या तो गंवाने के लिए और कर्म नियति की तूलिका से निर्णय के लिए तैयार रहता है।


लल्ला गोरखपुरी
#एक_विचार 🤗🌹🤗🌹

Sunday, July 7, 2019

तुम हो मैं हूँ हम हैं
तजुर्बे की मछली पकड़ते हुए
उम्मीदों की नाव में

तुम हो मैं हूँ हम हैं
धो रहे कपड़े की तरह जिस्म
निचोड़ रहे पसीना

तुम हो मैं हूँ हम हैं
समय के कपाल पर बुन रहे हैं अक्षर
अक्षर होने के लिए

तुम हो मैं हूँ हम हैं
सीमा से ऊपर समय का पंख लगाये
उस पार से इस पार तक

तुम हो मैं हूँ हम हैं
पहरे की पहरेदारी पर
पहर के आगे

तुम हो मैं हूँ हम हैं
विचारों को दृष्टि देने के लिए
दर्शन के शिखर पर

तुम हो मैं हूँ हम हैं
सकल विश्व के सृजनार्थ
अर्धनारीश्वर जैसे

तुम हो मैं हूँ हम हैं
विवेचना के उत्कृष्ट मंच पर
मौन के तरह

तुम हो मैं हूँ हम हैं
सृजन के अथाह गर्भ में
प्रेम की भाँति

तुम हो मैं हूँ हम है
जन्म जन्मांतर की असीम यात्रा में
तुम मैं हम होकर



(लल्ला गोरखपुरी)

Thursday, June 20, 2019

Chintan

क्या होता है जब कुछ समझ में नहीं आता? क्या होता है जब अंदर की हलचल मानो हर दीवार को तोड़ देना चाहती हो? क्या होता है जब आंखों का वाटर लेवल धीरे धीरे डाउन होने लगता है और एक समय बाद हो जाती हैं बंजर आंखें, हाहाहा ! मत सोचो! मत सोचो इतना कि चिंता की कुदाल से उपजाऊ हो जाये तुम्हारा दिमाग और उसमें उगने लगें अवसाद के बरगद। नहीं संभाल पाओगे उसकी फैलती हुई जड़ें इतनी आसानी से जितनी आसानी से रोपोगे नाहक बातों के बीज। शब्दों की ऊर्जा पहचानो! ये हैं विचित्र बीज जो बदल लेते हैं खुद की पहचान तुम्हारे शरीर में बदलते हुए सकारात्मक, नकारात्म, चिंता और चिंतन रूपी मौसम के साथ।
     ये वही शब्द हैं जो किसी के लिए चुनौती तो किसी के लिए अवसाद का रूप ले कर उगने लगते हैं। जिस प्रकार दाल की खेती अनावश्यक वर्षात में नहीं संभव है उसी प्रकार चुनौतियों तथा संकल्प की खेती, आंखों की अनावश्यक बारिश में असम्भव है। सींचो ! मगर भाव से, अपनी समस्त पौध को, जो रोपे हो अपने दिल में और जिससे पाना चाहते हो अपनी इच्छाओं के फल। तुम्हारे संकल्प अरहर के फली के जैसे हैं जो लेंगे समय, जिनको नही जरूरत है अनावश्यक जल की उनको बस चाहिए समय समय पर भाव के सजीव जल, स्वयं को परिपक्व करके उपभोग के योग्य होने हेतु।
    माना कि समय असमय छेंक लेते हैं तमाम झंझावातों के टिड्डि दल और खाने लगते हैं तुम्हारे संकल्पों के फल पर तुम्हे स्वयं पैदा करना होगा सकारात्मकता का मौसम और छिड़कना होगा संकल्प के वृक्ष पर संघर्ष की दवाई, तभी तुम बचा पाओगे उन्हें दिल के जमीन पर।
      खड़ी की जाएंगी तमाम मनोवृत्तियों की दीवारें और घेरा जाएगा तुम्हे, फिर जकड़ा जाएगा कोई एक विचारों का कमरा दे कर और छीन लिया जाएगा तुम्हारे विचारों का स्वछंद घोड़ा।
      इसीलिए तैयार करो अपने चिंतन का हथौड़ा जो नेस्तनाबूद कर दे इन दीवारों को।
       आगे बढ़ो ! रोपते जाओ! बस रोपते जाओ स्वयं के होने का उचित कारण।

फिर मिलेंगे अगली कड़ी में..
फिर होगी #ख़ुद_से_बात
#उनके_लिए😊

(लल्ला गोरखपुरी)

Wednesday, March 27, 2019

"फ़िकर में माँ न होना तुम,
बनो तो बाप बन जाना,
नहीं तो शक के कीड़े
दीमकों सा घर बना लेंगे"

Friday, March 22, 2019

बुद्ध से कबीर तक

क्या हुआ? क्या सोच रहे श्रेष्ठ?  हवा के हल्की छुअन से हिलते हुए पत्तों के समान ओष्ठ पल्लव और खनखनाती हुई आवाज में आर्य ने प्रश्न किया,
कुछ नही बस आत्मदर्शन, श्रेष्ठ ने उत्तर दिया।

आर्य- आत्मदर्शन! कौन सा आत्म दर्शन?

श्रेष्ठ- कौन सा से क्या आशय है आर्य? स्वयं के प्रति प्रतिबद्ध होकर आत्मावलोकन की स्थिति को समझ रहा हूँ, यही आत्मदर्शन।

आर्य- अच्छा! परन्तु स्वयं को समझ रहा हूँ यह बात कुछ समझ में नही आयी। किस प्रकार का आत्मावलोकन है तुम्हारा? कृष्ण के कर्मयोग का जिसमे गृहस्थ सन्यासी की चर्चा हुई है या भक्ति योग की जिसमे सन्यास की बाते हैं ?

श्रेष्ठ- हाहाहा! कर्म सन्यासियों  से अछूता है क्या?

आर्य- बिल्कुल नहीं परन्तु कर्म की दुदुम्भी गृहस्थ ही बजाते हैं और गृहस्थ को सन्यासी से  श्रेष्ठ ही कहा गया है।

श्रेष्ठ- कर्म की दुदुम्भी गृहस्थ ही बजाते हैं? हाहाहा! आर्य! कर्म की दुदुम्भी कर्म स्वयं बजाता है

आर्य-अच्छा! स्वयं कैसे?
श्रेष्ठ- जैसे हृदय पर धड़कन की थाप अविचल निरंतर एक आयाम तक पड़ती है उसी प्रकार किसी क्रिया में सक्रिय हुए अथवा स्थिर हुए के साथ भी कर्म जुड़ा रहता है।

आर्य- ठीक है, फिर इस कर्म की गति क्या है?

श्रेष्ठ- चेतना की गति ही कर्म की गति है।

आर्य- फिर अचेतावस्था में लोग अकर्मण्य होते हैं?

श्रेष्ठ- हाहाहा! चेतना का तात्पर्य मात्र बाह्य क्रियाओं को संपादित करने की स्थिति मात्र से नहीं है ,मस्तिष्क का वह भाग भी सदैव चैतन्यता को ही दिखाता है जो प्राणी को जीवित रखा है।
अंतः क्रिया भी कर्म को फलीभूत करती है।

आर्य- अच्छा ठीक है परंतु आज के समय के कार्य क्या तुम्हारे आत्मदर्शन को पुष्ट करते हैं?

श्रेष्ठ- बिल्कुल आर्य! बिल्कुल करते हैं।
आर्य- वह कैसे?

श्रेष्ठ- कार्यों के प्रति निष्ठा और ईमानदारी जो कि सदैव बोध कराती है सतचित का और यही तो एक मार्ग है आत्मदर्शन तक पहुंचने का।

आर्य- क्या जो निष्ठा और लगन के साथ गलत कार्य करते हैं वो भी इस आत्मदर्शन को जान सकते हैं?

श्रेष्ठ- बिल्कुल जान सकते हैं।
आर्य- वह कैसे?

श्रेष्ठ- ठीक उसी प्रकार जैसे अंगुलिमाल और वाल्मीकि ने जाना होगा जब अपने कार्यों के प्रति उनके विचार और निष्ठा एक दिन सतविचार और सत्यनिष्ठा से टकराये होंगे।

आर्य-अच्छा! लेकिन आज के परिवेश में ये स्थितियां दुर्गम जान पड़ती हैं

श्रेष्ठ- बिल्कुल दुर्गम तो हैं पर सुगमता से सटे हुए
आर्य- सुगमता से सटे हुए?

श्रेष्ठ- असल में बात यह है कि दुर्गम कुछ है ही नही बस रास्तों की सुविधाएं घटा या बढ़ा दी गयी हैं।

आर्य- हाहाहा! सही कहा श्रेष्ठ! फिर भी यदि ये सब तुम्हारे नजर में सुविधाएं हैं तो फिर लोग परेशान क्यूँ हैं? इन सुविधाओं को सुव्यवस्थित करने में लग क्यूँ नहीं जाते?

श्रेष्ठ- लगे तो हैं सभी सुव्यवस्थित करने में ही लगे हैं, कुछ मात्र विचारों से और कुछ माझी बनकर।
और इन्हीं कारणों से ये सुविधायें किसी के लिए घटी हैं तो किसी के लिए प्रचूर हैं

आर्य- आज रुपयों पर हवन करने वाले आत्मदर्शन को पा सकेंगे?

श्रेष्ठ- यदि उनमे लोक कल्याण की भावना है तो निःसंदेह

आर्य- यदि सभी अपने कल्याण में लगे हों तब भी तो लोक कल्याण सम्भव है?

श्रेष्ठ- स्वकल्याण, लोककल्याण की स्थिति को तभी प्राप्त कर सकती है जब उसमे परिवेश की प्रसन्नता समाहित हो अन्यथा कभी नहीं।

आर्य- सही कहा श्रेष्ठ!

श्रेष्ठ- आज का भौतिवादी समाज शांति तो चाहता है परंतु आत्मकेंद्रीयता के मूल्य पर नही बल्कि लोकभावनाओं के आस पर जो कि अस्थायी है या है ही नही।

आर्य- तो क्या आत्मकेंद्रीयता सन्यास से संभव है? जैसा कि बुध्द ने किया और आत्मदर्शन तक पहुंचे?

श्रेष्ठ- नहीं! बिल्कुल नहीं यह एक मार्ग अवश्य है लेकिन केवल यही एक मार्ग है ऐसा नहीं है।

आर्य- तो फिर दूसरा मार्ग क्या है?
श्रेष्ठ- दूसरा मार्ग! दूसरा मार्ग है समाज के बीच में ही सक्रिय रहकर समाज के बीच में नित्य घटित होने वाली घटनाओं को देखना, विमर्श करना और लोक कल्याण हेतु उसी समाज का मार्गदर्शन के साथ साथ आपसी प्रेम और सद्भाव को स्थापित करना और कराना, कुरीतियों और रीतियों के अंतर  का बोध कराना आदि जिसे बाबा कबीर ने जीया और समाज की हर डोर को जोड़कर प्रेम रूपी धागे और कटु सत्य रूपी सुई से सीया।

आर्य- वाह श्रेष्ठ वाह! तुमने मुझे सन्यास और गृहस्थ सन्यास के अंतर को ठीक ठीक समझाया।

श्रेष्ठ- दोनों ही स्थितियां श्रेष्ठ ही हैं आर्य क्योंकि दोनों अंततः इसी समाज और मानव विचार तक लोककल्याण की भावनाओं के रूप में पहुंचती हैं।

आर्य- अर्थात, बुद्ध से कबीर तक!
श्रेष्ठ- हाहाहा! बिल्कुल आर्य!

आर्य- चलो श्रेष्ठ पुनः मिलना होगा नये प्रश्नों के साथ अगली कड़ी में

श्रेष्ठ- निःसंदेह ! शुभ हो! फिर मिलते हैं।।




अभिषेक(लल्ला गोरखपुरी)

Thursday, January 24, 2019

भूमिकाओं के निर्धारण में सीमाओं की बाध्यता

भूमिकाओं के निर्धारण में सीमाओं की बाध्यता ठीक उसी प्रकार है जैसे नदियों पर बांध का बनाना। असमय जब किरदार की भूमिकाओं को बदलने की कोशिश की जाती है तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि किरदार की मूल प्रकृति क्या है या यूँ कहें वह स्वयं की पहचान भूलने लगता है शायद इसका मूल कारण हमारे इर्द गिर्द घूम रहे लोगों की आकांक्षाएं हैं और सभी अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप हमें चलाने या चलने के लिए सुझाव देते हैं, वे भूल जाते हैं कि प्रकृति के द्वारा प्रदत्त ये अरबों खरबों पिंड जिन्हें हम मस्तिष्क कहते हैं उन सबकी अपनी प्रकृति और अपनी भूमिका होती है जिसको केवल और केवल उस पिंड का मालिक ही चला सकता है ना कि अन्य। हां यह बिल्कुल सत्य है कि उनके अनुभवों की पुड़िया किरदार के लिए औषधि का काम करती है फिर भी हर औषधि सभी शरीर के लिए लाभकारी नही हो सकती। यह लेख उसी किरदार के लिए है जो रोज स्वयं से जद्दोजहद करता है कि वह क्या करे? हालांकि उसे यह पूरी तरह पता है कि वह क्या बेहतर कर सकता है फिर भी बांध बनाये जा रहे हैं कि उसको किस दिशा में बहना है? सच कहूँ तो ये निर्माणकर्ता हमारे आपके बीच के ही लोग हैं जिन्हें सिर्फ कहना होता है कुछ बोलना होता है भले वह उन अनुभवों से पूरी तरह रूबरू हों या ना हों। उनकी बातें सिगरेट के धुएँ की तरह रुक रुक कर प्रवाहित होतीं हैं और आखिरी कश में बचते बचाते मुहँ को जला ही देती हैं।
वह कहते हैं ना कि-

"कुछ लोग सुनते नहीं, सुनाने लगते हैं
ज़ुबाँ की मुहब्बत से हक़ जताने लगते हैं
जिसने झेली नहीं कभी गम-ए-किरदार की तपिश
वो भी आफ़ताब को आईना दिखाने लगते हैं"

जल की शुद्धता उसके स्वतंत्रत प्रवाह में निहित है और इसे समझना होगा बांध बनाने से यह रास्ते तो बदल लेगा परन्तु जब इसमे अपनी मूलप्रकृति की चेतना जागृत होगी तो सब जलमग्न कर देगा और चारो तरफ केवल और केवल वही दिखेगा क्रांति की छाती पर चढ़कर विध्वंस के  उद्गोष के साथ नवसृजन का अमृत कलश लिए हुए "युवा"


(लल्ला गोरखपुरी)

Thursday, December 27, 2018

अचानक खिलखिलाहट के बीच चुप हो जाना मानो अनुभूतियों का चालक बिठा लेता है उसे यादों की ट्रेन में और फिर शुरू हो जाती मौन की यात्रा रात के सन्नाटे पर सवारी करते हुए, अच्छा भी है ज़िन्दगी की यात्रा में छोटे छोटे स्टेशनों का आना जहाँ उतर कर वह अनुभव करती यथार्थ का वैसे मौन होना आवश्यक है क्यूंकि मौन संवाद करता है नियति की अनुभूतियों से, मौन संवाद करता है स्वयं के अस्तित्व से, मौन संवाद करता है वास्तविकता से, मौन संवाद करता है नई दिशा से, मौन संचित करता ऊर्जा के पिंड को मौन पिंड में और फिर स्थापित करता है अपने मापदण्डों पर। जिंदगी में गर्दिश भी है नूर भी है  पर कभी कभी ढक दी जाती है वह बादलों से जो शीतल तो दिखते हैं पर छेंक लेना चाहते उसकी वास्तविकता को उसके नूर को जो केवल और केवल चाहते खुद की रोशनी बनाना। उसके अंतर्मन को समझे बिना और वह उलझ जाती लड़ती और फाड़ देना चाहती उलझनों को मकड़ी की जाले की तरह। हवा कितनी बंधी है? प्रकाश कितना बंधा है? विस्तार कितना बंधा है? और आकार कितना बंधा है? वास्तव में इनकी स्वतंत्रता में ही इनका जीवन है और बांधने की स्थिति में इनको खो देना है। वह भी ऐसी ही है नूर है जो एक दिन इसी स्याह समंदर से निकलेगी और स्वयं को स्थापित करेगी। सत्य ही कहा उसने जहन की खरोंचें आत्मा तक को छील देती हैं
वह निर्मल धारा है जिसकी प्रवित्ति बहना और बहते रहना है, समझना होगा नदियों पर बने बाँध कुछ समय के लिए नदियों की दिशा बदल सकते हैं पर उसकी प्रवित्ति को कदापि प्रभावित नहीं कर सकते यदि ऐसा प्रयास होता है तो वह दिखाने लगती अपना विस्तार जहाँ बस और बस वही रहती और कुछ नहीं।
चलना चाहता हूँ मैं भी उसकी अनंत यात्रा पर उसके साथ उस नाविक की नौका बनकर और निकालना चाहता हूँ उसे परिस्थितियों के ज्वार भाटे से और बहना चाहता हूँ साथ साथ निर्मल नदिया की धार में प्रकृति की वास्तविक प्रकृति में।
इन्हीं अनभूतियों की लहरों में नियति से संवाद करते हुए नई अनुभूतियों को प्राप्त करती और उन अनुभूतियों से पुनः नियति का निर्धारण करती, प्रकृति की गोद में बैठी प्रकृतिपुत्री

#फिर होगी मुलाक़ात

फिर होगी #खुद से बात☺️

#प्रकृतिपुत्री

Tuesday, October 2, 2018

किरदार तुम्हारा सदा चहकने वाला है

अंधियारे की चादर ओढ़े सोया जो
सूर्य दीप्ति ले फिर से जगने वाला है

घबराओ मत पौध मेरी आशाओं की
वसुधा का यह रूप संवरने वाला है

है मशाल जो जली यहां की झुग्गी से
घोर तिमिर का बंधन कटने वाला है

सुनो!किरायेदारों वापस घर आओ
घर अपना ही विश्व बदलने वाला है

और पिलाओ विष का गागर जल्दी से
नीलकंठ का रंग उतरने वाला है

अस्त व्यस्त ही सही रहूँगा संग तेरे
सदा तेरा किरदार चहकने वाला है

     लल्ला गोरखपुरी....

Saturday, September 1, 2018

हमें एक संग चलना है

सूरज की हो बूंदा बांदी
या जल बन फट जाए बादल
हो बाणों सी तीखी बातें
या अंधकार बन जाये काजल
इसी समय को ढाल बनाकर
इसी समय से लड़ना है
हमें एक संग चलना है।।

लिए चलें अनुभव को प्रति पल
नियति के निर्णय को निश्छल
हम जीवन के रंगमंच पर
लिख दें एक कथानक पागल
मैं किताब तुम अक्षर अक्षर
खुद को खुद से पढ़ना है
हमें एक संग चलना है।।

तुम धारा हो गंगाजल की
शिव के शीश जटा से छलकी
तपोभूमि का मर्म तुम्ही हो
तुम्ही नाद हो कल कल की
हो माझी मैं नाव तुम्हारा
सप्तसिंधु तक बढ़ना है
हमें एक संग चलना है।।

(लल्ला गोरखपुरी)
#प्रकृति पुत्री#

चैन की कुंडी

चैन की कुंडी पर टंगी बेचैनियां,
अक्सर खनखना जाती हैं
सुनकर ,
बसंती हवा में घुलती धुएँ की सनसनाहट।

और धरती सा हृदय
काँप जाता है
धड़कन के भूकंप से।

फूटने के लिए
तैयार हो जाती है
नई धारा,
आँखों के जल श्रोत से।

और इसी बीच
जब आती है आवाज
ठंड के अकड़न को तोड़ती हुई
गुनगुनाती धूप की तरह
मैं निखर जाता हूँ
अल्हड़ हँसी पुचकार से।

फिर समेट लेती है
तितली जैसे
बैठकर,
सारा सूनापन कुंडी से।

मिलता है नया स्वाद
हृदय को
हलक में,
उतरते थूक की तरावट से।

(लल्ला गोरखपुरी)
#(प्रकृतिपुत्री)

Monday, July 23, 2018

है पथिक जो तू अगर..

है पथिक जो तू अगर
तो तुझे चलना भी होगा
इस गगन में नित्य उगना
और फिर ढलना भी होगा

मंदाकिनी, आकाशगंगा
सब तेरे चरणों में हैं
मंत्र सी अभिव्यक्ति तेरी
भाव उर अधरों में हैं
अब सहस्त्रों सूर्य को
प्रदीप्ति देने के लिए

वक्ष पर मिथ्या के चढ़कर
ज्वाल बन जलना भी होगा
है पथिक जो तू अगर
तो तुझे चलना भी होगा।।

(लल्ला गोरखपुरी)
#प्रकृतिपुत्री

"मुक्तक"

1:- "क्या अज़ीब शौक पालता हूँ
       वक़्त बेवक़्त नज़्में उछालता हूँ
       दिखाने के ख़ातिर अंधेरे का चेहरा
       चिरागों में मैं रोशनी डालता हूँ"

2:- प्रतिमाओं को बदल कर देखते हैं
      इन हवाओं को बदल कर देखते हैं
      लोग भूखे पेट अब यह कह रहे
      देवताओं को बदल कर देखते हैं

(लल्ला गोरखपुरी)